Monday, 26 December 2016

राम राम जी


मुम्बई की शाख़ों से टूटा तो दिल्ली के पुराने दरख़्तों पे पनाह ली, मगर सर पे छत मिल जाना ही काफ़ी नहीं होता, गर्मी ने जब ख़्यालों को उबालना शुरू किया तो सुकून की तलाश में हिमालय की तराई में आकर क़याम किया, लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि यहाँ आकर सुकून की तलाश ख़त्म हो गई हो, हाँ मगर उन झमेलों से दूर, कुछ बेहतर है  | नेपाल से नज़दीक मगर हिन्दुस्तान की सरज़मीन पे बसा है ये छोटा सा गाँव, जहाँ से कुछ दूरी पे श्रावस्ती है, वो जगह जहाँ महात्मा बुद्ध अपनी ज़िन्दगी के दो साल बिताए थे | गाँव की आबादी मिली जुली है, हिन्दू, मुस्लिम और बोद्ध, तीनों मज़हब के लोग एक ही हवा में साँस लेते हैं | अब तक हवा का बँटवारा तो नहीं हुआ है मगर ज़मीन थोड़ी बंटी हुई दिखी कि गाँव के जुनूब और मग़रिब जानिब मुस्लिम बसे हैं और बाक़ी के दो सिम्त में हिन्दू और बोद्ध रहते हैं लेकिन दरगाह पे आपको तिलक और टोपी वालों में फ़र्क़ नज़र नहीं आएगा | 
मैं गुप्ता जी के दालान पे बैठा खाने का इंतज़ार कर रहा था कि तभी एक नौजवान टोपी पहने, चेहरे पे हल्की हल्की दाढ़ी और घुटनों तक लम्बा कुरता पहने मेरे क़रीब आकर बोला “राम-राम जी” और गुप्ता जी के घर के अन्दर दाख़िल हो गया | मैंने जवाब में राम-राम बड़ी आसानी और ख़ुश मिज़ाजी से बोल तो दिया था मगर ज़हन से निकल कर अजीबों ग़रीब क़िस्म के सवालात दिमाग पे हमला करने लगे लेकिन मेरा दिमाग़ भी इतना कमज़ोर न था कि उन सवालों का बेहतर जवाब न दे सके और इस तरह दिमाग़ और ज़हन के बीच होने वाली जंग की बला टली | इस हमले से थोड़ा थका हुआ दिमाग़ खाने के बर्तन पे आकर आराम करने ही वाला था कि दालान से नजर आ रही सामने वाली दीवार पे लिखा एक जुमला “गो हत्यारों को फाँसी दो” ने फिर से जंग का बिगुल बजा दिया था | इस बार मेरा दिमाग़ थोड़ा कमज़ोर पड़ने लगा था कि वो नौजवान फिर से मेरे क़रीब आकार रुका, मुझ से मेरा नाम पूछा, नाम सुन कर उस ने माफ़ी की दरख्वास्त करते हुए सलाम किया | मैं सलाम का जवाब देते हुए कहा “राम राम कहो या रहीम रहीम, मेरे लिए दोनों बराबर है” | ये सुन कर उसने मेरा हाथ अपनों हाथों में लिया पहले दोनों आँखों से फिर होठों से चूमने लगा जिस से साफ पता चलता था की गाँव वाले पीर बाबा का मुरीद होगा |
मेरे क़रीब बैठा एक शख्स मेरी तरफ़ देखा अपनी एक अंगुली दिमाग़ तक ले जा कर कहा “ये थोड़ा खिसका हुआ है” |

इस की बात सुन कर और नौजवान की मुहब्बत को देखकर, मन ही मन ये सोचने लगा कि काश दुनिया का हर इंसान इस नौजवान की तरह खिसका होता तो बेहतर होता कि मज़हब के नाम पे कोई लड़ाई न हो |          

Monday, 19 December 2016

Curbing the space of dissent and debate in JNU



The idea and slogan of we dissent, we debate, we are JNU might vanish from the land of JNU and the extinction of the right to speech will in near future catch the fire. Sarcastically saying, nothing will happen but only the environment and culture will change as in other university antipathy, antagonism and regionalism prevail and never give a chance to dissent and debate on one plateform, except few. Here in JNU atleast student dissent and debate, listen and respect others’ voice, grant opportunity to speak up without considering their political or ideological affiliation. But the time has ping the mind of certain ideological group of students and administration to murder the soul of this culture and curb all the space to float only one tune of ideology.
Grilled space of freedom Square (picture source: http://images.indianexpress.com/2016/12/c1.jpg)

Recently JNU administration has issued a notice mentioning the prohibition of all forms of coercions such as gheraos, sit-in or any variation of the same and further notified that all forms of peaceful and democratic protest shall be conducted with restraints. This was just after grilling of the space of freedom square which were using by the student to discuss the issues, to held public meeting, to debate, dissent and protest but administration has curbed the space on the ground of space crunch. The administration has not only blocked the space but on the stair where students use to sit during talk, meeting or protest, ordered the gardeners to spread the flowerpot to restrict the student for sitting. To be a student of JNU, I never thought of such doltish action would be taken by the administration which has happened where we were stop to sit on the stair. The irony of the notice is, one coercive administration is asking coercively to the students not to indulge in coercive actions and even coercively notifying to conduct peaceful protest with restraints. The banning of students’ voices and exclusion of student representatives by the administrative has witnessed after the 9th February incident and it intensified after disappearance of Najeeb. The administration doesn’t feel the need to consult the students’ representatives or include them in administrative or academic decision where students’ voice should be raised. The administration has not concerned to include student union in orientation program, in jan jan jnu program and many such events where the student representatives should have present. In contrast of the inclusion of students’ voice, JNU administration is crushing the efforts of the student to avail justice and to raise their voice and curbing the space of protest.


Flowerpot on the stair (Picture Source:http://images.indianexpress.com/2016/12/pots.jpg)
Few months back Ganga dhaba was on the radar of the administration to eliminate the dhaba culture of the university where students use to sit and discuss and among few of the spaces where social interaction encounter between the students community. When students’ protested and registered their solidarity with Ganga dhaba with some other factors came into the scene, dhaba has not been harmed. But this time administration has forcefully taken away the space and swallowing the culture of dissent and debate. In result of these coercive action the campus will be polarized, the students will never get into flavor of political thought and the students politics will either became ultra coercive minded or right wing students politics will be nurtured by the administration which later became biased, one sided political activities without dissent and debate. Infact the right wing students group has very good rapport with the Vice Chancellor and administration is kind with the students except the student who has leftist ideology. The scene of the other side is also alarming for the leftist students where they themselves are dissenting over the decision for proper action against snatching of the space. The freedom square amid of these fights will lose their life and student community will lose a historical place and effective, significant and value given space. This space has uncovered their importance after administration has grilled the area where students use to sit, this indicates that the voices from the freedom square bother them even though unheard. The administration suggested the student community to protest at Kamal Complex market which is infact a place from where voices would never be heard. Need of the time is to bargain the administration for the grilled space, peaceful demand for unlock the space and ensure that the open space should not be curbed in future.

          

Wednesday, 31 August 2016

Ganga Dhaba Poem

तहज़ीब ज़िन्दा रखेंगे

हुक्म हुआ कि साहेब को चाय चाहिए
ज़रा सी देर पर साहेब को गुस्सा आया
फिर कुछ देर हो गई
साहेब का ग़ुस्सा दफ़्तर में घूमने लगा
जब कुछ देर और हो गई
तो ग़ुस्सा दफ़्तर से बाहर निकला
और टूट पड़ा सब के सर पर

साहेब को चाय की देरी पर इतना ग़ुस्सा
हमारे चाय के ढ़ाबे पर ख़तरा है
हम बग़ावत पर उतर आएँ तो कम है
हम सड़कों पे निकल आएँ तो कम है
हम तोड़ दें तुम्हारा निज़ाम तो कम है
ढ़ाबे के पत्थर से उठ जाए शोला तो कम है
नर्म सब्ज़ा से उठ जाए पत्थर तो कम है
ढाह दें तुम्हारी दीवारें तो कम है

इन्हीं पत्थरों पे बैठ कर हम
चाय की चुस्कियों पे हम
अमन से इंक़िलाब तक की बात करेंगे
रोक लो तुम, हम तहज़ीब जिंदा रखेंगे  



تہذیب زندہ رکھیںگے

حکم ہوا کہ صاحب کو چاۓ چاہئے
ذرا سی دیر پر صاحب کو غصّہ آیا
پھر کچھ دیر ہو گی
صاحب کا غصّہ دفتر میں گھومنے لگا
جب کچھ دیر اور ہو گی
تو غصّہ دفتر سے باہر نکلا
اور ٹوٹ پڑا سب کے سر پر

صاحب کو چاۓ کی دیری پر اتنا غصّہ
 ہمارے چاۓ کے ڈھابے پر خطرہ ہے
ہم بغاوت پہ اتر آیں تو کم ہے
ہم سڑکوں پہ نکل آیں تو کم ہے
ہم توڑ دیں تمہارا نظام تو کم ہے
ڈھابے کے پتھر سے اٹھ جاۓ شولہ تو کم ہے
نرم سبزہ سے اٹھ جاۓ پتھر تو کم ہے
ڈھا دیں تمہاری دیواریں تو کم ہے

انہیں پتھروں پہ بیٹھ کر ہم
چاۓ کی چسکیوں پہ ہم
امن سے انقلاب تک کی بات کرینگے
 روک لو تم، ہم تہذیب زندہ رکھیںگے




Friday, 22 July 2016

कहानी : देश द्रोह

देश द्रोह

गौ माता को बिजली के खम्भे से सर खुजलाते देख मेरा दोस्त मुझ से पूछा अरे इसे कहीं बिजली तो नहीं लग गई ?”
मैंने कहा अगर बिजली लगी तो समझ लो हिन्दुस्तान से बिजली को पकिस्तान भेज दिया जाएगा और जो बचेंगा उसे गले में रस्सी बाँध कर पेड़ से लटका दिया जाएगा इसलिए बिजली की हिम्मत नहीं है कि गौ माता को कुछ कर सके |
उसने फ़ौरन बात काटते हुए कहा और अगर बिजली सच में लग गई हो तो?”
तो समझ लो अगले ही पल हिंदुस्तान के हर चैनल पे ख़बर नसर होगी कि बिजली हिंदुस्तान का सब से बड़ा देश द्रोह, देखिए कैसे?’ और फिर बहस होगी, कुछ विडियो क्लिप देखाए जांएगे, कुछ व्हाट्सअप पे वायरल होगा, सियासत में हलचल होगी, नेताओं का उस जगह दौरा होगा, भीड़ को वो ख़िताब करेंगे और कहा जाएगा कि दोस्तों मुझे पता है ये किस की चाल है, आप मेरा साथ दीजिये हम दुश्मनों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ेंगे, इस का बदला दुश्मनों और बिजली दोनों से ले कर रहेंगे......,  मैं कहते हुए थोड़ी देर साँस लेने के लिए अपनी बात को आधी अधूरी छोड़ कर एक लम्बी साँस ली और फिर बात को जारी रखा |
....और सब से पहले तो गौ रक्षक दल आएगी, जिसके आते ही पुलिस अपना बोरिया बिस्तर समेट कर दूर खड़ी जिप्सी में जा बैठेगी और वहीँ बैठे बैठे तमाशा देखेगी | इन सब बहस के बीच एक कमिटी का गठन होगा फिर आखिर में बिजली की सुप्रीम कोर्ट में पेशी होगी और फ़ैसला सुनाया जाएगा, जो मैं नहीं बताऊंगा वरना मेरी पेशी हो जाएगी कोर्ट में |”
इस बीच बात करते करते हम दोनों दोस्त उस बिजली के खम्भे के क़रीब पहुँच गए जहाँ गाय बिजली के खम्भे को छोड़ खम्भे को सहारा देने वाले तार से अपना सर खुजलाने लगी थी | ये देख मेरा दोस्त दौड़ कर गाय के क़रीब गया और उसे भगाने लगा ताकि ऐसे न हो कि बिजली का झटका लग जाए लेकिन हुआ कुछ और, गाय उल्टा उस पे दौड़ी और सर की खुजली उस को पटख कर उतार ली | चोट खाए, गुस्साए दोस्त ने बराबर में पड़े डंडे से गाय की धुनाई करनी शुरू कर दी, जब तक मैं उसे रोकता तब तक दो तीन डंडे बेचारी गाय को पड़ चुके थे | लेकिन अगले ही पल हम देखते हैं कि तीन चार नौजवान सर पे जय श्री राम का पट्टा बांधे, हाथ में डंडा लिए हमारी तरफ दौड़े आ रहे हैं, बस क्या था अब हमारी खैर न थी इसके सिवा के यहाँ से भाग निकलें, दोस्त का हाथ पकड़ा और भागना शुरू किया | पीछे पीछे गौरक्षक दल और आगे आगे हम दोनों ........ भागते रहे, भागते रहे... |

असरारुल हक़ जीलानी

3 जून 2016     

Monday, 27 June 2016

A complete package of culture and history with romance

A complete package of many love stories in one book, “Honour for a Ransom” has narrated not only soulful love stories in a poetic way but has given a glimpse of the culture and history of undivided India, divided India and England. Most of the story revolves around Kartar’s life but it also unfolds the other love stories which have heartbroken endings either because of the rigid caste system or partition of the country. 

There is no need to point out the quality and beauty of the language used and there is no doubt author has done justice with the regional language too. In fact it’s becoming a trend to Indianise English literature by using Indian words and phrases in between the dialogue, which is the demand of the readers as well as the characters and the same author has tried this method in this romantic piece of work.  Besides the language, the writing style is also up to the standard and the editor has done his job very wellwhich is evident in the book. 

The cover of the book which is quite attractive narrates the whole story without the reader having to turn the pages. The colour composition as well the design brilliantly portrays the story and creates a true perception in the reader’s mind.

Everything - the story, the language, and the writing style catches the attention but characters’ names are too confusing and a puzzle to resolve. Besides this, jumping between stories is an undesirable style of writing which diverts the readers and makes them think a lot to understand the story. 

The book not only narrates a tragic love story but with remarkable work of language, storing the culture and history too, is a good read to all kind of readers. 


Overall rating 4/5

Friday, 10 June 2016

Book Review: My stand on Heart of Bullets

“Heart of Bullets” by Nikhil Khushwala is a story of the struggle and sacrifices made by the soldier to protect the motherland. The tale of heroism and brotherhood, a tale of love and betrayal.

The story revolves around two childhood best friend Sam and Arpan. It’s about the twists and turns that they face in their life and yet keeping the bond of their friendship and love alive they faced the struggles of life. It’s about the choices that Arpan makes when Sam is hit by bullet.
                                  Heart of Bullets
The one liners of the story makes the reader hooked to book. The poem written are beautifully penned down that it makes interesting to read the story ahead.

The author has made quite good attempt for building a strong plot but the story in middle diverts form the life of soldier to the teenage love and then to a tragic filmy end with was a bit unreal.

The style of writing and the usage of words adds marvel to the story. The patriotism explained and the wars that have been carved so lively that it flashes before you as you read. The story with a moral of strong relationship bond is worth read.

Overall Rating: 4/5


Tuesday, 31 May 2016

ग़ज़ल : तुझ में बनता कोई मुस्लिम कोई .....

ग़ज़ल

तुझ में बनता कोई मुस्लिम कोई हिन्दू है
मगर क्या आदमी  बनने की जुस्तजू  है

क़ातिल कहे बिस्मिल दामन को थाम लो
उस को भी इल्म ये क्या चीज़ आबरू है

उस की ये आरज़ू  हालात ज़रा ठीक  हो
मुझे मगर हालात से  लड़ने की आरज़ू है

वाएज़ कहे  है आबरू  है  बुर्क़ा  लपेटना
चिलमन उठा कर देख मिट्टी सी आबरू है

बरहना फिरने  से ही  तरक्क़ी नहीं होती
मयार ए ज़हन तेरा तरक्क़ी की आबरू है


जुस्तजू - चाहत, ख्वाहिश,          बिस्मिल - जिसे क़त्ल किया जाए, 
इल्म - ज्ञान,             वाएज़ - उपदेशक, 
चिलमन - पर्दा                     बरहना - नंगा  



غزل

تجھ میں بنتا کوئی مسلم کوئی ہندو ہے
مگر  کیا    آدمی    بننے  کی  جستجو   ہے

قاتل کہے ہے بسمل دامن کو تھام لو
اسکو  بھی  علم  یہ    کیا  چیز   آبرو  ہے

اسکی  یہ  آرزو   حالات   ذرا   ٹھیک   ہو
مجھے مگر حالات سے لڑنے کی آرزو  ہے

 واعظ   کہے ہے  آبرو  ہے  برقہ   لپیٹنا
چلمن اٹھا  کر  دیکھ  مٹی  سی  آرزو  ہے
                                                                                                                 
برہنہ  پھرنے سے ہی ترقی نہیں ہوتی
معیار  ذہن   تیرا     ترقی   کی   آبرو  ہے 

Thursday, 19 May 2016

Review on "Hues of Modern love"

 With simple story line, the novel “Hues of Modern Love” has charm to impress the readers because of humor and attention-grabbing characters. The story begins in a train journey, where Cherry meets Joy and later joined by Zoiba who turns the conversation towards love and romance. As the train runs on the track love stories goes with the same pace, amid of this Cheery and Joy realizes that both had strong bonding with their ex but it is too late to fix it. Overall the story line is for young mind set people so I guess teenagers would enjoy it more and will associate with it. 

The style of narrating the story is in line with the contemporary writing manner however Author Paras has experimented with the writing style. He has used easy and basic English words so that anyone can understand and enjoy reading the piece with the usage of typical Indian phrases between the conversations. Some grammatical and formatting errors couldn’t distract me from the flow and charm of story. 


Recommendation: Read it for the very interesting characters of the story with good sense of humor. The book is for those who are in the phase of love or has ended up their relationships.


Rating: overall rating 3 out of 5.

Thursday, 28 April 2016

ग़ज़ल


 दिन का मुंह काला हो गया है
जब से मेरा चाँद खो गया है

ये कहकशां ये तारे ये आसमां
उसके जाते ही सब सो गया है

काग़ज़ पे नंगे पा चलते चलते
क़लम को मेरे घाव हो गया है

मैं था जो पहले हूँ अब भी वही
इस ज़माने को क्या हो गया है

शगल पूछते क्या हो असरार की
दिल से जां तक वीरां हो गया है


Thursday, 7 April 2016

मुहब्बत देख ली मैं ने


कल शाम जब अब्बा से बात की तो मुझे गाँव की याद आने लगी फिर उसी रात आँखों को नींद की मुलाक़ात से पहले कुछ ख्याल में गुम होने लगा तो देखता हूँ कि मेरे बाग़ से हवा की एक टोली मेरी गली होते हुए मेरे आँगन में पहुँचती है जहाँ से छलांग लगा कर मेरी दहलीज पे कूद पड़ती है और वहाँ रखे चिराग़ से खलेने लगती है | चिराग़ उस हवा के झोंकें से कांपता, थरथराता बुझने को होता है तभी उस में एक नया दम पैदा होता है और फिर उसी शान से जलने लगता है मगर उसी दम फिर वैसा ही शर्माने लगता जैसे कोई महबूबा हो जिसे उसका आशिक़ छेड़ रहा हो और वो शर्मा रही हो, दुपट्टे से अपना चेहरा छुपा रही हो मगर जब हद हो जाती हो तो वो तैश में आकर उसके बराबर शेरनी सी खड़ी हो जाती हो और फिर आगे वही छेड़ने और शर्माने का सिलसिला......| मैं ये देख कर मुस्कुराने लगता हूँ तो दरवाज़े से मेरे अब्बा मुझ से पूछते हैं वजह मुस्कुराने की, तो मैं कहता हूँ मुहब्बत देख ली मैं ने कि मुहब्बत में जीना हवा के झोंके के बीच चिराग़ों सा है |

A contemporary love story: The Justified Sin

Product DetailsBook Review:  The Justified Sin
The Justified sin has written by Harpreet Makkar, a passionate writer and a romantic poet. This romantic flavor of the novel has full of feelings, emotions and warmth of affections from a childhood love to the adulthood romance.
The story revolves around Jay who makes three different circle of love around three different girls Saloni, Prachi and Varsha but all the three incomplete and these all circles has the soul which you can feel during the reading. The best part of the book is the use of simple words in better way to explain enough the situation and also he didn’t waste the word to explain the useless background which he explained through the dialogue among the characters.
Word repetition and few editing mistakes are there in the book but it’s not affecting the charm of story in anyways.
Those who love to read contemporary love stories and romantic novel having pace, soul and spirit of young blood from 21st century, do read to take a dive into love with some real touch.
Rating:
Plot: 4/5
Character: 3/5
Style: 2/5
Editing: 3/5
Climax: 3/5

समीक्षा - 'रुह से रूह तक'

दो दिलों की एक मासूम कहानी  विनीत बंसल द्वारा रचित उपन्यास 'रूह से रूह तक' एक कोशिश है छात्र जीवन में प्रेम और फिर बनते बिगड़ते रि...