Tuesday, 28 April 2015

ग़म न कर ठहर के चल

ग़म न कर ठहर के चल
थकी थकी रगों से चल
रुको नहीं चलो मगर
उक़ाब सी नज़र से चल

सितम को भी आवाज़ दे
चमन को भी आवाज़ दे
दर्द भी मिले अगर
चलो मगर रुको नहीं
सोज़ ओ सितम पहन के चल
ग़म न कर ठहर के चल                

जिगर के खून से अगर 
कटे जो जालिमो का सर
मिटे जो तारीकियों का घर
हर बूँद मुझ से मांग लो
खून ए रहगुज़र से चल
ग़म न कर ठहर के चल 

मिटेंगे हम हुकूक पे
चलेंगे हम सुरूर से
कहेंगे हम गुरूर से
दहर से बहर तलक
पैग़ाम ए हक ले के चल
ग़म न कर ठहर के चल 

असरारुल हक़ जीलानी 

In Roman:

Gham na kar thahar ke chal
Thaki thaki rago se chal
Chalo magar ruko nahi
Uqab si nazar se chal

Sitam ko bhi awaaz de
Chaman ko bhi awaaz de
Dard bhi mile agar
Chalo  magar ruko nahi
Soz o sitam phan ke chal
Gham na kar ………

Jigar ke khoon se agar
Kate jo zalimo ka sar
Mite jo tariqiyo ka ghar
Har boond mujh se mang lo
Khoon e rahguzar se chal
Gham na kar ………..

Mitenge ham huqooq pe
Chalenge ham suroor se
Kahenge ham guroor se
Dahar se bahar talak
Paigham e haq le chal

Gham na kar ………..

Saturday, 18 April 2015

Margarita With A Straw: Disability porn or learn movie?

As there are very few movies in bollywood bag on disability issues but not on sexuality and romantic issues of disable person. Margarita With A Straw has been released yesterday in Indian cinema which has covered a journey of family and academic life of disable girl with emphasis on sexuality and her romantic life. The film revolves around the life of Laila who is suffering from cerebral Palsy (kind of disability), who manage to go New York University from Delhi University for her further study. The story of the film actually based on a real story of director’s sister Malini and now living her life happily. The director of the movie Shonali Bose said that “This film is actually based on my sister Malini. She also suffered from cerebral Palsy but she lived her life through the struggles and is still happily. She used to be more romantic than me and used to date guys, while I never dated anyone till I left India.”

Yesterday after watching this movie one of my friends said on Facebook that this is first ever disability porn movie and I am not in favor of this though I also watched it. First of all a movie couldn’t cover whole aspect of individual’s life though they touch one or two but emphasize one issue, in this also director tried to show the romantic and sexual life of a disable person and this doesn’t mean that all disable person is so. Second as director herself said that my sister was more romantic than me so she can’t forget this reality. Though this is slightly material movie but not porn but emphasize the romantic life a disable person. Let me say one thing which prevail in our society is the unaware or ignorance of romantic life of a disable person. Even they can’t imagine that disable person should have their romantic life and can be bisexual as in this movie Khanam was bisexual who was blind also. I think time has come to accept disable person with all his capabilities and characteristics they hold and taboos should be challenged. Somehow this movie tries to show this lesson.

Director has tried to put her best effort to make it good movie but it is average movie though Kalki was brilliantly acted as cerebral Palsy affected individual. It is worth to go for movie if you want to explore different issues other than bollywood type movie and if you love to see good acting then go for Kalki’s acting. 

Friday, 17 April 2015

ख़ामोशी के दरीचे से

ख़ामोशी दरअसल दवा है हजारों सवाल का और कुछ इसे वबा भी कहते हैं यानि अगर ख़ामोशी हद से ज्यादा हो जाये और वक़्त पे इलाज न हो तो नासूर बन कर चुभती भी है और चुभाती भी है अपने आस पास वालों को | लेकिन मिया ! वल्लाह क्या मज़ा है खामोश रहने का जैसे खुद ही खुद के सरताज हों, जैसे ग़ालिब मिया का “होता है शब ओ रोज़ तमाशा मेरे आगे” और उस तमाशे का मज़ा लेते हैं, समेट कर हर मंज़र को रखते जाते हैं खुद में अंदर कहीं | और तो और मेरे दोस्त सब से मज़े कि बात तो ये है कि जब हम खामोश रहते हैं अंदर कुछ पकता रहता है |

हमें लगते है कोई खामोश है मगर होता नहीं है| अब मुझे ही देख लीजिये शाम से खामोश हूँ लेकिन अंदर एक दुनिया चल रही है जिस में शाम को तूफान आया था फिर बरसात हुई और अभी हल्का हल्का मद्धम आंच में कुछ पक रहा है | हालांकि कुछ पकने में थोडा देर लगता है लेकिन जब निकलता है तो खामोश रहने वाला शख्स ही उससे फैज़याब नहीं होता बल्कि हजारों लोग और कभी कभी पूरी इंसानियत लुत्फ़ अन्दोज़ होती है | अब लीजिये न न्यूटन साहेब को बेचारे घंटो पेड के नीचे बैठ कर सोचते रहे कि आखिर सेब नीचे क्यों गिरा और मियां ग़ालिब अपनी तन्हाई शराब के साथ और ख़ामोशी कलम के साथ गुजारी तो मिया क्या कहने उनके अशआर के, मीर साहेब ने दर्द को ज़बान दी बड़ी ख़ामोशी में और न जाने कितने शायर हैं जो ख़ामोशी को तो पसंद करते ही थे साथ ही साथ पकाते भी थे अंदर कुछ नज़्म ओ ग़ज़ल |

खामोश रहना अगर कोई सीखे तो पीरों और सूफियों से जिनको देख कर आप भी खामोश हो जाएँ, ज़बान को रोक लें और बक बक करना छोड़ दें | अल्लाह के वाली होते है वो जो लफ्जों को गिन कर बोलते हैं | ऐसे भी वली गुज़रे हैं जो पुरे दिन कितनी बेकार बातें कि और कितनी अच्छी गिन कर सोया करते थे और ये अहद लिया करते थे कि आइन्दा कम बोलेंगे हालांकि वालियों और सूफियों कि एक एक बात हज़ार कि होती है|

ये मैं क्यूँ लिखने बैठ गया | अच्छा याद आया अभी आ रहा था दोस्तों के साथ, तो मियां मैं बड़ी ख़ामोशी से सडकों पे चलती हुई महफ़िल को साथ दे रहा था लेकिन मैं खामोश नहीं था कुछ पका रहा था अंदर| लेकिन ये क्या जनाब किसी ने छेड़ दी “हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले“ बस क्या था मैं भी गाने लगा और फिर तरन्नुम से झूम उठी पूरी महफ़िल और मैं मस्त हो गया, फिर बात होने लगी उर्दू पे, उर्दू ज़बान पे| लेकिन इस से हुआ ये कि मेरी ख़ामोशी टूट गयी और वो जो कुछ पक रहा था अंदर वो अध पका रह गया, थोड़ी देर बाद गया अंदर और फिर से ख्याल को चढ़ा आया तब जाकर ये कुछ लफ्ज़ पक कर आप के सामने हाज़िर हुए हैं |  


असरारुल हक जीलानी
तारीख: 18 अप्रैल 2015 

Tuesday, 14 April 2015

A Research Proves Brahmins are Foreigners

A surprising conclusion of a research done by American scientist Mr. Michael Bamshad, Utah University has came into the light all over the world that the Brahmins are foreigners in India. BeyondHeadlines​ and Prof. Vilas Kharat, Director, Dr. Babasaheb Ambedkar Research Centre, New Delhi has tried to challenge the ignorance of the Brahmin which diluted the fact among the population and make aware the Mulnivasi Bahujan people.

If you have secular digestive system then eat it and if you don't have then also read it because it may help you to plan to communalize the issue or you can plan for ghar wapisi. Here is the link of the report http://beyondheadlines.in/2014/04/american-scientist-proves-brahmins-are-foreigners/.  I am not saying that Brahmin people are worst for the country but every community have the right to live peacefully in the country and you too but don't say someone to go Pakistan though they are citizen of India and stop saying about the ceasing of voting rights of Muslims and Christians. And also stop planning to divide the community for the purpose of hiding the fact as you people were doing in the history and still going on and not only you but all the community for vested interest. Instead of wasting your time on these crap issues why not we all use up time to live with all the differences. 

Sunday, 12 April 2015

परिन्दे पुकारते है तुमको कैम्पस में

कैम्पस में कोयल की आवाज़ यूँ गूँज रही है जैसे तमाम तोलबा व तालबात से कह रहा हो कि तुम कहाँ को चल दिए जबकि अब तो आया है मौसम ए बहार। देखो कुछ और मेरे दोस्तों को जो मेरे साथ चहक रहे हैं डाली-डाली और पुकारते हैं तुम्हारे रूह को इस इदारे की ज़मीन पर। उनको पता है अब कुछ दिनों बाद यहाँ ख़ामोशी होगी, लोगों का चहल पहल कम हो जाएगा लेकिन ऐसी ख़ामोशी का क्या करना जहाँ हवा की सरसराहट के पीछे कोई इंसानी सरसराहट न हो। दरअसल तुम नहीं जानते मियां इंसान हम चरिन्दे परिंदे तुम से खैर नहीं खाते, लेकिन जब तुम हद से गुज़र जाते हो और मरे हक को नज़र अंदाज़ कर देते हो | तुम्हारे मौजूदगी ही तो मेरे जीने का मकसद है, तुमने सुना नहीं कुरान में हमारे, तुम्हारे और सारी दुनिया के बनाने वाले ने क्या कहा है | मेरे पड़ोसियों, मेरे प्यारे तालिब ए इल्मो कभी-कभी मुझ से गुस्ताखी हो जाती है कि हम लोग बेखयाली में तुम्हारे बदन पे या कपड़ों पे बीट कर देते हैं जिस वजह कर तुम गुस्सा होते हो और न जाने क्या क्या बद-दुयाएँ देते हो, मगर क्या कभी तुम ने अपनी गलतियों और गुस्ताखियों पे नज़र डाली है | तुम बड़े मज़े से चिउगम चबाते हो और यूँही कहीं सड़क पे फेंक देते हो जिसे हम रोटी का टुकड़ा या कोई खाने का लज़ीज़ आइटम समझ कर गटक लेते हैं और फिर मौत | ऐसे भी न जाने क्या क्या तुम्हारे नफ्सियती खावाहिशों कि वजह से लोग बनाते रहते हैं , हर रोज़ कुछ न कुछ नयी चीज़ लांच होती रहती है अब कौन उन सब के बारे में इल्म रखे तो कम अज कम तुम ही उन हरकत का ख्याल रखो जिन से हम लोगों को कोई नुकसान न हो वरना तुम से बेहतर तो हम हैं कि हम घर भी बनाते हैं तो तिनके इन्सान के घरों से तोड़ कर नहीं लाते | वैसे टीस (TISS) कैम्पस में कोई ऐसा घर भी नहीं है जहाँ से नोच कर तिनके लाऊं लेकिन बला कि हरियाली है इस लिए तो दोस्त तुम्हारी यद् आ रही थी |

Monday, 6 April 2015

I Don't want

I don’t want

I don’t want to touch you girl
Though I am a man among thousands of men
I am among men who live for sex not for rape
I am a man who sees you but not stalk
Who pass by you but not stare
Who has penis but not for wrong penetration
Who has hand but not to rub you forcefully
Some of you sometimes
rub your cleavage to my arm 6
intentionally in buses, at crowded place, in the train
I have dignity thus I don’t want
There are some among me who touch you intentionally
But not me
I am a young men, desire in my heart but
I don’t want to touch you lady
Though you have cleavage
Your attractive body to sue me
You have pink lips
But unattractive for me
I don’t want to kiss you
I don’t want to **** you
I don’t want to rub you
But my love


Asrarul Haque Jeelani
Date: 4th April 2015

समीक्षा - 'रुह से रूह तक'

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