Friday, 27 June 2014

ज़िन्दगी बस रंग ही तो है


ज़िन्दगी के दरख़्त पे 
पत्ते जो लगे हैं 
बस रंग ही तो है 
कुछ लाल, कुछ हरे 
कुछ स्याह तो कुछ सफ़ेद 
और फिर उम्र के एक मोड़ पे 
गुलाबी रंग भी शर्माता, मुस्कुराता
डोली सजा कर आ जाता है 
उगाने किसी टहनी पे एक फूल 
जो बहलाता देती है 
और कहती है 
ज़िन्दगी बस रंग ही तो है 
पीते पीते नीले रंग का साँस 
किसी पतझर के मौसम में 
लपेट कर सफ़ेद चादर 
हिलता डुलता हवा में तैरता गिर जाऊंगा 
मिल जाऊंगा पीले रंग में 
और कहूँगा
ज़िन्दगी बस रंग ही तो है   

Transcription

Zindaghi ke darakht pe 
Patte jo hain
Bas rang hi to hai
kuch laal kuch hare 
kuch syah to kuch safed
Aur phir umar ke kisi mod pe 
Gulabi rang bhi sharmata muskurata
Doli saja kar aa jata hai
Oogaane kisi tahni pe ek phool 
Jo bahla deti hai 
Aur kahti hai
Zindagi bas rang hi to hai
Peete peete nile rang ka sans
Kisi patjhar ke mausam mai
Lapet kar safed chadar 
Hilta dulta hawa mai tairata gir jaunga
Mil jaunga peele rang mai
Aur kahunga
Zindagi bas rang hi to hai

Thank you all for giving feedback. I am transcribing the poems in English script fro the ease of those who can not read Devnagiri script.

Tuesday, 24 June 2014

नम आँखों की मुस्कान 

बयाबाँ ए तख़य्युल में  तेरी यादों की खेती की हैँ 
खयालो की बंजर ज़मीन को
तेरे चेहरे की नूर से ज़रख़ेज़ की है 
पुराने बीते हुए लम्हों से काट कर 
कुछ टहनियों को बोया हूँ 

और कभी  कभी आँसुओं की बारिश  से 
नम  करता हूँ ज़मीं  को 
फिर  काटता हूँ हर रोज़ 
हर सुबह हर शाम 
हर पल तेरी यादों की  फ़सल 
जिसपे आँसुओं का खोल होता तो है मगर 
जब छील कर हटाता हूँ उसे 
तो नम आँखों से मुस्कुरा देता हूँ 

                                                        असरारुल हक़ जीलानी           

Saturday, 21 June 2014

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

मेरे  माथे  पे  तेरी  यादों  का  टप्पा पड़ा  है 
तेरी ज़िन्दगी में मेरा भी कुछ हिस्सा पड़ा है 

कमरे की तन्हाई में तेरी परछाई लिए बैठा हूँ 
सुना है  अँधेरे  में तेरे हुस्न  का हिस्सा पड़ा है 

कमबख्त उम्मीद है खत्म होती  ही नहीं है 
पीछे  मेरे हुस्न  आगे  मेरे  मक्का  पड़ा है  

वो जो तोड़  कर लाया था तेरे चेहरे का नूर 
मेरे लफ़्ज़ों में उसी नूर  का क़िस्सा  पड़ा है 

डायरी क़लम किताब छोड़ो मेरी ज़िन्दगी के 
हर  सफ़हे  पे  तेरे  नाम  का  हिज्जे  पड़ा है 

                                                                          असरारुल हक़ जीलानी 

Friday, 20 June 2014

Tasweer Tumhari: A poem

तुम्हारी तस्वीर 


हरे हरे ख्वाबों को तराश कर

देता हूँ शकल पत्तों का 

गीले गीले अहसास के क़तरों से 

ख्यालों की टहनियों पे चिपकाता हूँ उन पत्तों को 

फिर तसव्वुर के तने से जोड़ देता हु उनको 

तो बन जाती है तुम्हारी तस्वीर 


                                                                                        असरारुल हक जीलानी 

I Access poem

I ACCESS

Dream above the sky
Sky over the head
Goal above the peak
Vision rooted in the soil
Emotions deep in the sea
dreams..vision..goal
Sky..stars..moon
All up and downs of the peak
I can access

Walk to the end
Run for the chase
Fly to the highs
Recite for the peace
walk.. talk.. fly..
to feel my being
speed sound place
All space I can access

No matter little number of near ones
No matter no dear ones
love.. peace.. energy..
I can access

No matter of broken wing
No matter of any king
I have will ..i am king
king of things
things that you access
I access

                                              Asrarul Haque Jeelani

This poem is written for I Access Right Mission : TISS initiative for Inclusion

समीक्षा - 'रुह से रूह तक'

दो दिलों की एक मासूम कहानी  विनीत बंसल द्वारा रचित उपन्यास 'रूह से रूह तक' एक कोशिश है छात्र जीवन में प्रेम और फिर बनते बिगड़ते रि...