Monday, 22 December 2014

एक दरख्शां तो है

एक दरख्शां तो है 


क्या फ़र्क़ पड़ता है 
वो मेरी जां हो कि ना हो 
एक दरख्शां तो है 
चलो उस पे मर के देखते हैं
होश गंवा के देखते हैं 
थोड़ा पर जला के देखते हैं  
वो मेरा यार हो कि ना हो 
हुस्न ए इन्सां तो है 
एक दरख्शां तो है 

क्या फ़र्क़ पड़ता है 
वो मेरी जां हो कि ना हो 
चलो इश्क़ कर के देखते हैं 
तड़प के देखते हैं 
थोड़ा महक के देखते हैं 
वो मेरी  हम सफर हो कि ना हो 
ज़रा मेहरबां तो है 
एक दरख्शां तो है


क्या फ़र्क़ पड़ता है 
वो मेरी जां हो कि ना हो 
चलो बात करके देखते हैं 
हाल ए दिल बता के देखते हैं 
थोड़ा सता के देखते हैं 
वो मेरी जानां हो कि ना हो 
सबब ए दिल ए परेशां तो है 
एक दरख्शां तो है


क्या फ़र्क़ पड़ता है 
वो मेरी जां हो कि ना हो 
चलो कुछ शेर कह के देखते हैं 
अफसाना सुना के देखते हैं 
थोड़ा नज़्म बना के देखते हैं 
वो मेरी कहकशां हो कि ना हो 
असरार ए ज़ुबां तो है 
एक दरख्शां तो है

असरारुल हक़ जीलानी
तारीख : 22 दिसम्बर 2014

दरख्शां : Dazzling - extremely bright, especially so as to blind the eyes temporarily,  beautiful
कहकशां : galaxy
असरार : mystery, secret

Wednesday, 17 December 2014

Terrorist ke khilaf pakistani bachho ke nam


पाकिस्तानी बच्चो के नाम 

जा मेरे वक़्त के शहीदो जा
तूझे वक़्त से पहले
वक़्त के दरिंदो ने डस लिया
जा मेरे पाक बच्चे
जा मगर कहना खुदा  से
सब कुछ जो तुम ने देखा है
कहना अपनी  वहशत को
कहना की वो कहते हैं
तुम्हारे नाम पे लड़ते हैं हम
मगर बेगुनाहो का खून करते हैं
मिलेंगे तुम से वो
तो कहना अपनी हिंदुस्तानी बहन  की दास्ताँ भी
वो भी तो इसी दिन शहीद हुई थी
और कहना हिन्द पाक की दास्तान भी
कि हमेशा लड़ते रहते हैं
और अभी भाईचारगी आ गयी है
कि ऐसा ही  रखे दोनों को 

Friday, 5 December 2014

SOCIAL VOLUNTEER

SOCIAL VOLUNTEER

One of my colleague in social sector told me to write something on volunteerism because yesterday (5th December) was international volunteer day but I couldn't write. In short I am writing here something.

It is fact that almost all the social sector, voluntary organisation, government organisation or any other institution who claim their contribution in the social change, they do by the hand of volunteer but the real hero who do the contribution are ignored. No educational institution is caring about the volunteerism, no discussion, not in syllabus content not even in social work course. It should be talk, discuss, encourage and conceptualized. I refer one term for those volunteer who somehow do their work in social sector, contribute in social welfare, social change that is social volunteer.

The social volunteers those who contribute their time, energy and effort for the social cause and social change should be the end of effort.
It is time to think about volunteerism, about the rights of volunteer by the social thinkers, social work academician.

Wednesday, 3 December 2014

aao na mere qatil by asrar

आओ न मेरे क़ातिल 

आओ न मेरे क़ातिल 
मेरे काफिर आओ न
आदत ख़ामोशी की मन को लगी थी 
चोट किसी शोर की दिल को लगी है 
किसी भीड़ की तूफान से जो टकड़ा गया हूँ 
अब दिल की वादी बिखर गयी है 
टूटे  हुए  घर की  दीवार दिखानी है    

आओ न मेरे क़ातिल 
मेरे काफिर आओ न                                        

मैं कहता हूँ कुछ भी तो नहीं हुआ है अभी 
अभी रगों में तेरी दौड़ तो बाक़ी है 
अभी दिल में तेरी आस बाक़ी है 
अभी साँस बाक़ी है
बहुत सी है बात कहनी है 
आओ न मेरे क़ातिल  
मेरे काफिर आओ न

आना उसी झील के किनारे पे 
उसी बोलती गूंजती सी वादी में 
जहाँ नाचती थी तितलियाँ तेरी आवाज़ पे 
मेरी दुनिया थी तेरी आँखों में
अभी और भी गुज़ारिश करनी है 
आओ न मेरे क़ातिल 
मेरे काफिर आओ न


असरारुल हक़ जीलानी 
तारीख : ३ दिसम्बर २०१४ 

Wednesday, 19 November 2014

POEM : MERE TAKIYE KI ZAMEEN

मेरे तकिये की ज़मीन 

मेरे तकिये का जो गिलाफ है 
तेरे ख्वाबो में अटा हुआ है 
तेरे रंगों से पटा हुआ है 
हर रात को उगता है तेरे चेहरे का सूरज 
हिज्र के खेत में बोता हूँ विस्ल के बीज 
अश्कों की बारिश से सिंचता हूँ उसे 
और डालता हूँ आरज़ू व मिन्नत के खाद 
फिर भी न जाने क्यों 
चुभता है ये तकिया मेरा 
सिर्फ तेरे ख्याल से 
ज़िंदा है मेरे तकिये की ज़मीन 

हिज्र - जुदाई ,    विस्ल - मिलन ,   अश्क - आँसू 


Mere takiye ki zameen

Mere takiye ka jo gilaf hai
Tere khawabon main ata hua hai
Tere rango se pata hua hai
Har raat ko ugta hai tere chehre ka suraj
Hijar ke khet main bota hun wisal ke beej
Ashkon ki baarish se sinchta hun use
Aur dalta hun aarzoon minnat ke khad
Phir bhi na jane kyun 
Chubhta hai ye takiya mera
Sirf tere khayal se 
Zinda hai mere takiye ki zameen


Monday, 29 September 2014

Poem : मेहरबाँ लगती हो

मेहरबाँ लगती हो

तुम नज़्मों को मेरे याद करती हो
अब तो तुम मेहरबाँ लगती हो 

फैला कर मेरे दाग़ ए दर्द को  
ढूँढती हो उसमें कोई ख़्वाब गिरे पड़े 
चुन चुन कर हर अल्फ़ाज़ को मेरे  
बुनती हो फिर वही ख़्वाब पुराने
जैसे ख़्वाबों की मलका लगती हो  
अब तो तुम मेहरबाँ लगती हो 

मेरे यतीम लफ़्ज़ों को घर ले जा कर 
अपनी आवाज़ का लिबास पहना कर 
ज़ुबान पे रखती हो 
दिलो जां से जानाँ  
मेरे लफ़्ज़ों पे रक़्सां करती हो 
अब तो तुम मेहरबाँ लगती हो 


वो खाली खाली सा दिन अब बाक़ी नहीं रहा 
वो शाम की उलझनें ख़ुदक़शी कर ली है 
हाँ ये अलग बात है कुछ खलिश है अभी 
मगर तख़य्युल में जानाँ 
हमेशा तुम मेरे दरमियाँ लगती हो 
अब तो तुम मेहरबाँ लगती हो 


Sunday, 21 September 2014

तू मेहरबाँ होगी

मैंने समझा था कि तू मेहरबां होगी
सेहरा में उलझे मुसाफ़िर का आसरा होगी
तू किसी तरह मनाओगी बहलाओगी
किसी रूठे हुए परिंदे को बुलाओगी
पंख उसके जोड़ोगी सहलाओगी

संवारोगी परवाज़ के हर ख़्वाब को उसके
भर दोगी ललकार से हर ज़ज्बात को उसके
सजाओगी सीलन पड़ी हर दीवार को उसके
टाँग दोगी कहीं पे अपनी हँसी
पिन कर दोगी अपनी मुस्कान मेरे कमीज़ पे

मगर जलता है शबो रोज़ तेरी याद से मेरा
तू कहीं पे छोड़ी कोई निशां होगी
मैंने समझा था कि तू मेहरबां होगी

मगर तू कितनी ज़ालिम है
तुझे बुलाऊँ भी क़रीब तो बहाना मिले
तुझे सुनाऊँ भी कुछ तो रुख़ बेगाना मिले

अपनी ज़मीर को, ख़ुदी को पिघला कर मैंने
तेरे ख़्वाब को ढाला है
नज़्म के रोग को पाला है

हिम्मत को  सुजाअत को बटोर कर मैंने
तेरी क़ुर्बत को अपनाया है
ख़्वाबों में कितनी शिद्दत से चाहा है

मगर तू कितनी ज़ालिम है
एक मुस्कान का भी न सहारा दिया
किसी लफ्ज़ का भी न किनारा दिया

मगर फिर भी में समझता हूँ
एक दिन तू मेरी जानां होगी
तू हक़ीक़त में मेहरबां होगी

Saturday, 30 August 2014

ये मैं सोचता हूँ

मैं क़रीब आऊँ तुम्हारे 
और जगाऊँ नींद से तुम्हें 
ज़ुल्फ़ के बादल को बटोर कर 
अपने ख़यालो में समेट लूँ 
ये मैं सोचता हूँ 

पास बैठूँ बता दूँ तुम्हें 
तुमको मैं चाहता हूँ तुमसे ज़्यादा 
तुम्हारे नक़्स मैक़दे के कूंचे से बेहतर है 
तुम्हारा रंग थोड़ा तितलियों ने चुराया है  
ये मैं सोचता हूँ 

जब मेरे पास तुम नहीं होते हो  
जब मैं तन्हाई में बिखर जाता हूँ 
अब जब भी तुम आओगी 
उसी लम्हे खोल कर हर लफ्ज़ कह दूँगा 
ये मैं सोचता हूँ 

जब तुम पास आते हो 
बिखरा हुआ वजूद सिमट जाता है तेरी क़ुर्बत में 
लगता है मिल गया मुझे सब कुछ 
अब बताने की ज़रूरत क्या है तुमको ?
ये मैं सोचता हूँ 

मैंने जो उगल दी थी स्याह रातें 
फटे पुराने दिन को फेंक दिया था नोच कर 
उसे अपनी आँचल से पोछ कर 
सी कर दिन को अपने ज़ुल्फ़ के धागों से 
मेरे डायरी के सफ़हे पे फिर से जोर दोगी 
ये मैं सोचता हूँ 

YE MAI SOCHTA HUN

Mai qareeb aaun tumhare
Aur jagaun Nind se tumko
Zulf ke badal ko bator kar
Apne khayalon mai samet lun
Ye mai sochta hun

Pas baithun bata dun tumhai
Tum ko mai chahta hun tumse zyada
Tumhare naqs maiqade ke kunche se behtar hai
Tumhara rang thoda titliyon ne churaya hai
Ye mai sochta hun

Jab mere pas tum nahi hote ho
Jab mai tanhai mai bikhar jata hun
Ab jab bhi tum aaogi 
Usi lamhe khol kar har lafz kah dunga
Ye mai sochta hun

Jab tum pas aate ho 
Bikhara hua wajood simat jata hai teri qurbat mai
Lagta hai mil gaya mujhe sab kuch
Ab batane ki zarurat kya hai tumko?
Ye mai sochta hun

Maine jo ugal di thi syah ratain
Phate purane din ko phaink diya tha noch kar
Use apni aanchal se pochh kar
Si kar din ko apni zulf ke dhago se
Mere diary ke safhe par phir se jod dogi
Ye mai sochta hun




Monday, 18 August 2014

KHAWAB

ख़्वाब 


तुमने देखा होगा ख़्वाब यहाँ पे 

बादल के चादर में लपेट कर खुद को 

नींद के झूले में झूल जो रही थी कल 

हमने भी झुका के सर 

तेरे रूह के एहसास पे टिका कर आँखों को 

पलकों को सुला था ख़्वाब के दरवाज़े पे 

कि शायद तुम आओगी 

जगाओगी और कहोगी 

मैं ख़्वाब नहीं हूँ 

KHAWAB

Tumne dekha hoga khawab yahan pe
Badal ke chadar mai lapet kar khud ko
Nind ke jhule pe jhul jo rahi thi kal
Hamne bhi jhuka ke sar 
Tere rooh ke ehsas pe tika kar aankhon ko
Palako ko sula diya tha khawab ke darwaze pe 
Ki shayad tum aaogi
Jagaogi aur kahogi
Mai khawab nahi hun

Sunday, 3 August 2014

Bal Kavita : wrote for construction worker children who are taught by ABC Campaign

                              बाल कविता 





                                       मेरा हाथ है कितना प्यारा 
छोटा छोटा न्यारा न्यारा
हम इससे हैं खाना खाते 
पानी पीते इसी हाथ से 
नाख़ून कभी ना बढ़ने देते 
साफ सफाई का ध्यान रखते 
माँगना हम ने छोड़ दिया है 
है पढ़ना लिखना इसी हाथ से 


चिड़िया मेरी दोस्त है
चंदा मेरा मामा है 
चींटी मेरी नानी है 
पेड़ मेरा छाया है 
नहीं मारना चींटी को 
चंदा ने बताया है 
नहीं मारना चिड़िया को 
पेड़ ने सिखाया है 



ईंट पत्थर बालू कंकड़ 
नहीं छुएँगे हम कभी 
माता-पिता जो करते काम 
नहीं करेंगे हम कभी 
मज़दूरी कोई करवाएगा 
नहीं करेंगे हम कभी 
बालू  कोई ढुलवाएगा
नहीं ढोएंगे हम कभी
बिना पढ़े बिना लिखे 
नहीं सोएंगे हम कभी 
शौक से स्कूल जाना 
नहीं छोड़ेंगे हम  कभी 
स्कूल जाना मेरा हक़ 
कामो  हम नहीं जाएंगे  
पढ़ना लिखना मेरा काम 
अनपढ़ बन कर नहीं  रहेंगे



Tuesday, 22 July 2014

खेत की पुकार

खेत की पुकार 

काले काले जले भुने से 
कफ़न में लिपटी थी उसकी लाश 
खोला हटा कर देखा कफ़न को 
तो साँस लेती थी उसकी लाश 
क़रीब बैठा, पूछा 
अभी तो पिछले फ़सल में तुम 
जागते थे पीले फूलों के साथ 
गन्दुम की लहलहाती 
झुरमुट सी बालियों के साथ 
और आज किसने दफ़ना दिया 
तुम्हारे हँसते गाते तन को 
जलते धुँआ में साँस लेता खेत 
सूखे आँसुओं का क़तरा बहा कर कहने लगा
वो नादान दहकाँ  
ज़रख़ेज़ी का नुस्ख़ा समझ कर 
जला दिया मेरे जिस्म के बालों को 

गन्दुम - गेंहू , दहकाँ - किसान , ज़रख़ेज़ी - उर्वरकता

KHET KI PUKAR

Kale kale jale bhune se
Kafan main lipti thi uski lash
Khola hata kar dekha kafan ko
to sans leti thi uski lash
Qareeb baitha puchha
Abhi to pichhle fasal main tum
Jagte the peele phoolon ke sath
Gandum ki lahlahati 
jhurmut si baliyon ke sath
Aur aaj kisne dafana diya 
Tumhare hanste gate tan ko
Jalte dhuwan main sans leta khet 
Sukhe aansuon ka qatara baha kar kahne laga
Wo nadan dahkan 
zarkhezi ka nuskha samajh kar 
Jala diya mere jism ke balo ko

Meaning 
Gandum - Wheat, Dahkan - farmer , Zarkhezi - fertilizer

Thursday, 10 July 2014

A story : Catch me if you can

                          कैच मी इफ यू कैन 
                                                               

नये कपड़े, नई जगह, नये लोग कितने अच्छे लगते हैं ना और ऐसा नहीं है कि पुरानी चीज़ों से मोहब्बत नहीं होती है, होती है मगर ऐसे जैसे अपने वतन की मिट्टी से होती है।  मैं भी ज़िन्दगी की दौड़ में एक चौराहे से आगे बढ़ कर कॉलेज में दाख़िला ले ली थी जो मेरे लिए एक अच्छी ख़बर थी जहाँ सब कुछ नया सा था, दोस्त, जगह, माहौल और मौसम भी। मैं ने पिछले पुराने पलों को  मौसम-ए -खिजा का इंतज़ार किये बग़ैर उसके यादों के सारे पत्ते काट गिरा दिये थे लेकिन इस लिए नहीं कि अपनी ज़िन्दगी के दरख़्त पे पत्ते उगाउंगी, ये तो सोची भी नहीं थी। बस ये था कि रगो को  चूसने वाले सारे पल मैं छोड़ आई थी।
इसी नए मौसम में एक नया पेड़ भी उगा, पत्ते भी आए और खुशबू  अब तक तैरती है, जो मेरा सब कुछ है। अगर लम्हे को कोई फ्रेम करने वाला हुनरमंद होता तो मैं उस से कहती कि एक बड़े से फ्रेम में उस लम्हे को फ्रेम कर दो जब वो मुझे पहली मरतबा  देखा था और फिर कुछ ही पलों में वो मेरी आँखों से यूँ ओझल हो गया जैसे किसी फिल्म का प्रोमो हो, जैसे उस को पर लगे हों सो फ़ौरन उड़ कर बादलों में जा छिपा  हो या किसी तारे को मना कर लेन गया हो , मेरे लिए। और उस फ्रेम को कमरे के सामने वाली दीवार पे लगाती।
हर स्टूडेंट के ज़ुबान पे रहने वाला कॉलेज का टी प्वांट जहाँ पे चाय तो मिलती ही थी साथ ही साथ दिल भी मिलते थे। उसी प्वांट से उस रोज़ मैं गुज़र रही थी तो अंजाम ने मुझे देखा था जैसा वो कहता है, दौड़ कर मेरे क़रीब आया और बग़ैर किसी की मौजूदगी की परवाह किये मुझ से हाय किया, बोला मैं  अंजाम और एक जुमला  इंग्लिश में कहा " कैच मी इफ यू कैन " । उसे मैं ठीक से देख भी नहीं पायी थी कि वो दौड़ लगाई और मुझ से इतना दूर जाकर खड़ा हो गया कि सिर्फ मैं देख सकती थी कि वो खड़ा है। एक मरतबा मेरी तरफ देखा, हाथ हिलाया और गायब। मैं सोची होगा शायद कोई पुराना जानने वाला। मैं क्यूँ उसको पकड़ू, क्यों उसे जानूँ।होगा कोई सरफिरा। मगर फिर भी उस पल का एक कार्बन कॉपी मेरे दिल पे उतर गया था।
दूसरी मुलाकात ऐसी थी जैसे दूर खड़ा कोई साया मुझे चाह भी रहा हो और चिढ़ा भी रहा हो इस तरह कि कह रहा हो पकड़ लो अगर पकड़ सकती हो और ग़ौर से देख भी रहा हो। इस से पहले कि मैं उसे देख कर मुँह फेर लेती उस ने कहा " कैच मी इफ यू कैन " और फिर कैंटीन की भीड़ में खो गया था वो चेहरा।  मैं क्यों उस के पीछे जाती ? क्यों मैं भीड़ को तहस नहस करती हुई उसे पकड़ती ? वो मेरा क्या लगता था।  मगर हाँ पिछली मुलाकात का वो जो कार्बन कॉपी था उसे एक और साथी मिल गया था दूसरी यादगार की शकल में।  मैं उसके इस पागलपंती को झटक कर चाय ली और अपनी दोस्त के साथ क्लास करने चली गई।
तीसरी मुलाकात तो एक अजीब इत्तेफ़ाक़ था। लाइब्रेरी में एक किताब ढूंढ़ रही थी "फेमिनिज्म एण्ड हिस्ट्री " जॉन वालेच की, उसी वक़्त मुझ से कोई टकराया , सॉरी के आर तक भी नहीं पहुँचा होगा कि जब वो मुझे देखा तो कैच मी इफ यू कैन कह कर यूँ भागा जैसे कोई पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेगी । मैं उस वक़्त ख़ूब हँसी और उसके हाथों से गिरी किताब को दुपट्टे से साफ की और उसकी जगह पे रख दी। ये वो मुलाकात थी जब वो, जिसे अजनबी कहती थी अपना सा लगने लगा था , जिसके दूर होने पर भी क़रीब जाकर कम  से कम उसका नाम पूछ लेना चाहती थी। मैं उस पल अपनी सारी बेपरवाही से आगे आकर उसके बारे में सोचने लगी थी और ये सोची कि अगले मरतबा उससे नाम पूछूँगी। मगर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि वो जब भी मुझे देखता दूर से ही कैच मी इफ यू कैन कह कर भाग जाता। और उस इत्तेफ़ाक़ के बाद कई बार ऐसा हुआ। मैंने तो एक बार उसे इशारे से बुलाई भी थी मगर वो सच में सरफिरा था।
एक दिन मेरी झोली में इत्तेफ़ाक़ आया, देखी अन्जाम चुपचाप सर झुकाये किसी सोच में चला जा रहा है । मैं अपनी दोस्त की ओट लेकर उसके क़रीब पहुँची और फ़ौरन उस का  हाथ पकड़ ली और ऐसे चिल्लाई जैसे मैंने क़िला फतह कर ली हो। ख़ुशी के मारे सीना फूल गया था, होटों पे मुस्कानों ने डेरा जमा लिया था और मेरी आँखों में इतनी सारी  ख़ुशी घुस आई थी जिसके लिए जगह बनाने को आँखें बड़ी करनी पड़ी। वो मेरी तरफ देखा और मुस्कुरा दिया। मैं पूछी " तुम क्यों कैच मी इफ यू कैन कह कर भाग जाते थे। वो एक मरतबा नज़र नीचे किया और फिर नज़रें मिला कर कहने लगा " यही मेरे परपोज़ करने का अंदाज़ है, मोहब्बत को हासिल करने का तरीका है। मैंने जब तुम को पहली मरतबा देखा था मुझे तुम से उसी वक़्त मोहब्बत हो गयी थी।"

                                                                                    असरारुल हक़ जीलानी




        

Saturday, 5 July 2014

   ग़ज़ल 

उठी  है  आवाज़ तो  रहेगी देर तलक 
रात रोशन  हो  जाएगी  सवेर  तलक 

जब  जल  जंगल ज़मीन चिल्ला उठेगी 
मरकज़ भी हिल जाएगी कुछ देर तलक 

आवाज़ हिमालय की निकल आएगी  
बस  हमें इंतज़ार  है  कुछ  देर तलक 

हक़ की  आवाज़ कब खामोश बैठी है 
उठेगी तो  झुक  जाएंगे दिलेर तलक

जो लफ्ज़ हैं धुँआ धुँआ सी चोटियों पे 
बसी है ज़िन्दगी बादलों के घेर तलक  

                                                                 असरारुल हक़ जीलानी 


ये ग़ज़ल मैंने तब लिखी थी जब मैं उत्तराखण्ड आपदा में  उत्तरकाशी गया था वहाँ का नीड असेसमेंट करने। 


Uthi hai aawaaz to rahegi der talak
Raat roshan ho  jayegi sawer talak

Jab jal  jangal  zameen chilla uthegi
Markaz bhi hil jayegi kuch der talak

Awaaz  Himalaya  ki  niakal ayegi 
Bas hamen intezar hai kuch der talak 

Haq ki awaaz kab khamosh baithi hai
Uthegi  to jhuk  jayenge  diler  talak

Jo lafz hain dhuan dhuan si chotiyon pe
Basi hai  zaindagi badalo kr gher talak




Friday, 27 June 2014

ज़िन्दगी बस रंग ही तो है


ज़िन्दगी के दरख़्त पे 
पत्ते जो लगे हैं 
बस रंग ही तो है 
कुछ लाल, कुछ हरे 
कुछ स्याह तो कुछ सफ़ेद 
और फिर उम्र के एक मोड़ पे 
गुलाबी रंग भी शर्माता, मुस्कुराता
डोली सजा कर आ जाता है 
उगाने किसी टहनी पे एक फूल 
जो बहलाता देती है 
और कहती है 
ज़िन्दगी बस रंग ही तो है 
पीते पीते नीले रंग का साँस 
किसी पतझर के मौसम में 
लपेट कर सफ़ेद चादर 
हिलता डुलता हवा में तैरता गिर जाऊंगा 
मिल जाऊंगा पीले रंग में 
और कहूँगा
ज़िन्दगी बस रंग ही तो है   

Transcription

Zindaghi ke darakht pe 
Patte jo hain
Bas rang hi to hai
kuch laal kuch hare 
kuch syah to kuch safed
Aur phir umar ke kisi mod pe 
Gulabi rang bhi sharmata muskurata
Doli saja kar aa jata hai
Oogaane kisi tahni pe ek phool 
Jo bahla deti hai 
Aur kahti hai
Zindagi bas rang hi to hai
Peete peete nile rang ka sans
Kisi patjhar ke mausam mai
Lapet kar safed chadar 
Hilta dulta hawa mai tairata gir jaunga
Mil jaunga peele rang mai
Aur kahunga
Zindagi bas rang hi to hai

Thank you all for giving feedback. I am transcribing the poems in English script fro the ease of those who can not read Devnagiri script.

Tuesday, 24 June 2014

नम आँखों की मुस्कान 

बयाबाँ ए तख़य्युल में  तेरी यादों की खेती की हैँ 
खयालो की बंजर ज़मीन को
तेरे चेहरे की नूर से ज़रख़ेज़ की है 
पुराने बीते हुए लम्हों से काट कर 
कुछ टहनियों को बोया हूँ 

और कभी  कभी आँसुओं की बारिश  से 
नम  करता हूँ ज़मीं  को 
फिर  काटता हूँ हर रोज़ 
हर सुबह हर शाम 
हर पल तेरी यादों की  फ़सल 
जिसपे आँसुओं का खोल होता तो है मगर 
जब छील कर हटाता हूँ उसे 
तो नम आँखों से मुस्कुरा देता हूँ 

                                                        असरारुल हक़ जीलानी           

Saturday, 21 June 2014

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

मेरे  माथे  पे  तेरी  यादों  का  टप्पा पड़ा  है 
तेरी ज़िन्दगी में मेरा भी कुछ हिस्सा पड़ा है 

कमरे की तन्हाई में तेरी परछाई लिए बैठा हूँ 
सुना है  अँधेरे  में तेरे हुस्न  का हिस्सा पड़ा है 

कमबख्त उम्मीद है खत्म होती  ही नहीं है 
पीछे  मेरे हुस्न  आगे  मेरे  मक्का  पड़ा है  

वो जो तोड़  कर लाया था तेरे चेहरे का नूर 
मेरे लफ़्ज़ों में उसी नूर  का क़िस्सा  पड़ा है 

डायरी क़लम किताब छोड़ो मेरी ज़िन्दगी के 
हर  सफ़हे  पे  तेरे  नाम  का  हिज्जे  पड़ा है 

                                                                          असरारुल हक़ जीलानी 

Friday, 20 June 2014

Tasweer Tumhari: A poem

तुम्हारी तस्वीर 


हरे हरे ख्वाबों को तराश कर

देता हूँ शकल पत्तों का 

गीले गीले अहसास के क़तरों से 

ख्यालों की टहनियों पे चिपकाता हूँ उन पत्तों को 

फिर तसव्वुर के तने से जोड़ देता हु उनको 

तो बन जाती है तुम्हारी तस्वीर 


                                                                                        असरारुल हक जीलानी 

I Access poem

I ACCESS

Dream above the sky
Sky over the head
Goal above the peak
Vision rooted in the soil
Emotions deep in the sea
dreams..vision..goal
Sky..stars..moon
All up and downs of the peak
I can access

Walk to the end
Run for the chase
Fly to the highs
Recite for the peace
walk.. talk.. fly..
to feel my being
speed sound place
All space I can access

No matter little number of near ones
No matter no dear ones
love.. peace.. energy..
I can access

No matter of broken wing
No matter of any king
I have will ..i am king
king of things
things that you access
I access

                                              Asrarul Haque Jeelani

This poem is written for I Access Right Mission : TISS initiative for Inclusion

Friday, 7 March 2014


देख मियाँ पानी 
बात ये है कि 
ये जो अपने ख़वाब का अक्स 
छोड़े जा रहा हू 
लौटा देना हाँ 
कभी कही नदी पे 
झील पे मिलूंगा और कहूंगा 
दे दे मेरा ख़वाब 
तो दे देना 
                                                                             


Saturday, 1 March 2014

GOD'S OWN COUNTRY


                                     


                                                   GODS OWN COUNTRY
                                                                                                                   Asrarul Haque Jeelani


Back to the concrete country 
from God's own country (Kerala)
the four day was the trial day
in the paradise country
missing here the angels
prince and princess of the coconut country
who took us on their hand 
show their own country




student of Central university of Kerala
 in the cultural dress
a piece of peace







It was tough to express the feeling of pleasure in Kerala but I wrapped the whole trip in few words. I collected my all courage and skill to write this.   

Sunday, 2 February 2014

                       Soul has no distinction of sex

Human being is the assembling of body, mind and soul. The existence of difference, distinction and distinguishing factors are only the matter of body and mind and not of soul.  People are distinguished as male and female, black and white by his bodily feature, atheist, communist and religious by his mind but by soul, all are equal because it has connection with God. Various religions have their own but somehow equal concept regarding the soul. By the Islamic concept it is the command of God. Some religions like Hinduism have belief that every living organism possessed soul and this concept is called as animism but in some it is only of human being.  
The mind and the body is semi observable and observable entity respectively but soul is invisible like God but work as protagonist for body and mind. Body is the abode of soul where soul encountered with mind which pollutes the same. Though our soul is pure, have own words and prime source of peace. We never tried to read and catch the words of the soul.
The Theosophical society and movement of 19th century with aim of universal spiritual brotherhood has correctly worked on this subject and focusing these matters in their principle which is still much more relevant. Its one principle is God creates different races with view to developing different virtues in mankind and the next male and female are equal because soul has no distinction of sex. Both principle are very relevant to the contemporary world where racial conflict are encroaching on the land and the women are deprived of their right, losing their dignity and victimized by the dominating thought of male. So there is need of revival of the past thoughts of the movement to make change in the society and remember that every living organism have the same soul that we possessed which doesn’t distinguish male and female.

Wednesday, 22 January 2014

            WINTER VACATION DIARY

how I spent my winter vacation in different spaces for different causes



Training program at V.V Giri National Labour Institute

Topic of the training: ENHANCING COMPETENCE OF YOUTH IN DEALING WITH CHILD LABOUR
Period : 23rd December to 27th December 2013

Group living with sharing, listening thoughts, ideas, stories, residing in a hostel with a group of students who are pursuing same course but from different institution across the country shows self image and real worth of our institution. The 5 days of amazing hospitality and training program of V.V Giri National Labour Institute introduced not only the different aspects and corner of the child labour but it was the platform where we came across the beauty of Jamia, praiseworthy field work and supervision and also relevant course content of our department. We felt worthy and privileged after get in touch with the social work students of various institutions from different corner of the India.
 Came back with enthusiastic load of plans and ideas to do some work for and with child labour.















Muzaffarnagar camp visit :

My intense urge to meet the riot victim, to feel their wound made myself present in one of the Muzaffarnagar riot victim’s camp in Malkana village on second last day of the year. On 29th December 2013 I shared my wish to visit Muzaffarnagar camp with Mr. Afroz Alam Sahil (RTI activist) and Mr. Zakir Riyaz. Mr. Afroz had already visited few camps but Mr. Zakir has planned to go there so we three met each other and discussed plans and purpose to visit the camp. On the second day we moved to Muzaffar Nagar with the companion of Mr. Zakir and her sisiter, Mr. Zeshan and me.   

 It was my first experience to see the camp under the open sky in such cold month which told me to think and to enter in the drop of sadness. I went there with an aim to know about the child labour scenario because during the training program at V.V Giri National Labour Institute, I got the information that after the riot children are entering in the child labour but after the discussion with Mr. Zakir Riyaz, I went there by changed motive to know about the appearing student in the board exam so that we can do something for them. We met men, women, children and some key person. They suggested us to announce by the loudspeaker regarding gathering of 10th and 12th class appeared student. I entered in the mosque and announced, after few minute 6-7 students gathered. We interacted with them and told them to continue their study we will help. Before returning back to Delhi, seeing back to the camp was tearful. Came back with the same question why communal riot happens? 


Ten days of NSS special camp:


 The community where we live since long time with our ongoing student life is not able to provide real scenario of our abiding space but the institution’s initiative works like the window through which a student can peep into the community and come across the truth behind the curtain. The ten days NSS Special camp did the same from where I added lots of unknown problem of the community in my dictionary, Came to know about the people’s expectation from Jamia, got  exposure with the bundle of people’s ideas and suggestions who belongs to diverse background. It was the research work for the community need but I researched myself, it reflected me the need of my nourishing area for my development to work for the community.

For the motive to understand Jamia neighbourhood for constructive engagement
Date : 30th of December 2013 to 8th January 2014

To be a good follower of the leader is great task and no one gives attention toward this quality which makes a team successful. In this camp I tried my best to follow my group leader rightly and participated in the group activity as much as possible. I think I couldn’t represent myself better during the camp after trying my best but it is my pleasure to get consolation prize in best camper category.

समीक्षा - 'रुह से रूह तक'

दो दिलों की एक मासूम कहानी  विनीत बंसल द्वारा रचित उपन्यास 'रूह से रूह तक' एक कोशिश है छात्र जीवन में प्रेम और फिर बनते बिगड़ते रि...