Monday, 21 August 2017

Ghazal / غزل

غزل 

عشق  کے  بخت  میں  بھی   آخرت  ہے
ہجر  جہنم   تو   وصل    یار    جنّت      ہے


   ڈھل  کر جسم   بھی اب   کنگال   ہو   گیا  
روح  کے  بخت  میں  بھی   غربت    ہے


آپ میرے عشق  سے بھی ڈر  جاتے  ہیں
میں  تو   قہر  کو  بھی سمجھا   کہ رحمت  ہے


آپ  آیئے اب  تصویر   سے   نکل  کر  باہر
الزام   عشق   میرے  سر   پہ  بہت  ہے 


میں   نے  ہر   بار   تجھے   مایوس  ہی   رکھا
ارادہ   گناہگاری   میں  بھی   رحمت  ہے


آپ  کا  ہر  ایک جلوہ  غزل      پر  مجھ
 چشم  کے   عنوان  سے     محبّت      ہے



Ghazal

Ishq   ke   bakht   me   bhi   aakhrat   hai
Hijr   jahannum  to wasl e yar  jannat hai

Dhal kar  jism  bhi  ab  kangaal ho gaya
Rooh  ke   bakht   me     bhi   gurbat  hai

Aap   mere  ishq  se  bhi   dar  jaate  hain
Mai to qahar ko bhi samjha ki rahmat hai

Aap aayiye ab tasweer se nikal kar bahar
Ilzaam  e  ishq   mere   sar   pe  bahut  hai

Maine  har  baar  tujhe maayus  hi rakha
Iraada e gunaahgari   me  bhi  rahmat hai

Aap  ka  har ek  jalwa  ghazal   par mujhe

Chashm   ke   unwaan   se   muhabbat hai 


Bakht- kismat, gurbat- gareebi, 

Tuesday, 15 August 2017

मुशायरे में भारत माता की जय : ग़ालिब तेरे ही शहर में

“मुझे मालुम पड़ता है कि आपकी आमद यहाँ वक़्त से क़बल हो गयी है ?” “ग़ालिब* साहेब, आप और तुम की बंदिश में न रह कर बात की जाए तो बेहतर है क्यूंकि आप और तुम ज़ुबान से बोल देना सिर्फ़ इसकी अलामत नहीं है कि ग़ालिब मेरा अहतराम करता है या मैं ग़ालिब का एहतराम करता हूँ ठीक उसी तरह जैसे भारत माता की जय कहना क़तई सुबूत नहीं है कि कोई अपने मुल्क से मोहब्बत करता/करती है हालाँकि कुछ लोग इसी को हुब्बुल वतन (देशभक्त) होने का सनद मानते हैं और मैं इस से इनकार करता हूँ | रही बात तुम्हारे (लफ्ज़ में अहतराम व इज्ज़त न तलाशें) सवाल की तो मियाँ, कौन सा वक़्त और कैसी आमद, मैं तो बस तुम से मुलाक़ात करने इस तरफ़ बढ़ लिया, दुनिया में कहीं पे सो रहा हुंगा लेकिन रूह टहलती हुई इस तरफ़ आ निकली, सोचा तुम से वतन का कुछ हाल अहवाल बता दिया जाए हालाँकि तुम्हारे अहवाल से क्या लेना लोगों को, बस ग़ज़ल सुनते हैं तुम्हारी और वाह वाह कर के मस्ती से सो जाते हैं और वक़्त मिलता है तो उर्दू को दो चार गलियाँ भी दे देते हैं, दो चार क़त्ल भी कर देते हैं | खैर बात मुद्दे की करें तो जनाब मुल्क एक अजीब माहौल से गुज़र रहा है, हर तरफ़ चीख़ व पुकार, क़त्ल ओ ग़ारत है जैसे कोई औरत दौरान ए जचगी दर्द से कराह रही हो | जिनको कुछ लोग भारत माता कहते हैं और जिसे मैं अपना वतन कहता हूँ उनको हामला (गर्भवती) कर दिया है और एक नया मुल्क पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं और ऐसी पैदाइश मुल्क के लिए ख़तरा है जैसा सत्तर साल पहले एक मुल्क पैदा हुआ था जिसकी रंजिश हम आज तक झेल रहे हैं | हर सिम्त साया है किसी के मौत का या किसी ऐसी ज़िन्दगी का जो एक खौफ़नाक रंज लिए पैदा होगा |”


“तुम क्या कर रहे हो फिर ?” “हक़ीक़त कहूँ तो कुछ नहीं और अगर हिम्मत अफज़ाई के लिए कहूँ तो बहुत कुछ क्योंकि ऐसे वक़्त में एह्तेजाज़ कर लेना भी कमाल है, कुछ बोल लेना, कुछ लिख लेना भी बड़ा काम है जो मैं कर रहा हूँ | मैं कहने ये आया था कि तुम्हारे जाने के बाद कुछ लोगों ने तुम्हारे कलाम को जिंदा किया और अवाम फिर जान पाई कि कोई ऐसा भी शायर था जिसका नाम सफ़्हे हस्ती पे देर से आया मगर ग़ालिब हुआ ग़ज़ल की दुनिया में | उन तमाम नुमाया कामों में एक ये भी है कि तुम्हारे नाम का एक अकैडमी है और एक इंस्टिट्यूट भी यानि ग़ालिब इंस्टिट्यूट | 12 अगस्त 2017 को मेरा जाना हुआ था वहां, एक मुशायरा जश्न ए आज़ादी के सिलसिले से जिसे अंजुमन ए उरूज ए उर्दू हर साल मनाती आ रही है | मौजूदगी राहत इन्दौरी, गुलज़ार देहलवी, अशोक साहिल, मंज़र भोपाली, इकबाल अशर साहेब वगैरह की थी | अब मुशायरा जश्न ए आज़ादी पे था तो ज़ाहिर सी बात है वतन के नाम कुछ ग़ज़ल, नज़्म और गीत होंगे ही लेकिन मुशायरे की तहज़ीब में भारत माता की जय पहली मरतबा सुना | हुआ यूँ कि मंज़र भोपाली साहेब एक गीत समाअत फरमा रहे थे, बाद अज़ गीत के ऐवान ए ग़ालिब के बीच से एक नारा बुलंद किया गया ‘भारत माता की जय’ जवाब में ऐसा नहीं था कि आवाज़ बुलंद न हुई, उसी जोश ओ ख़रोश से भारत माता की जय भी कहा गया लेकिन मुझे ताज्जुब हुआ कि ये किस तरह की तहज़ीब जिंदा करने की कोशिश की जा रही है कि एक तहज़ीब का जामा दूसरी तहज़ीब को पहनाया जा रहा है | मंज़र भोपाली साहेब के इस जवाब से दर्द झलकता है कि ‘लिजिये हम ने भी जय कह दिया अब तो सारे मसले ख़त्म हो जाने चाहिए’ | दरअसल ग़ालिब साहेब अब वो दिन दूर नहीं जब कुछ झूठे वतन के आशिक़ कुछ लोगों से जनाज़े की नमाज़ पे भी भारत माता की जय कहने को कहेंगे लेकिन जब इन से कहा जाए कि मादर ए वतन जिंदाबाद कहो तो वो उर्दू होने की वजह से इनकार कर देंगे | खैर चलता हूँ |                    


* सुखन ए ज़मीन, उस्दाद ए ग़ज़ल, शख्सियत ए तर्ज़ ए नौ मिर्ज़ा असदुल्लाह खान ग़ालिब , आप को तुम कहने का मक़सद सिर्फ़ ये बताना था लफ्ज़ ए भारत माता कि जय में देशभक्ति में नहीं है जिस तरह लफ़्ज़ों में एहतराम नहीं बल्कि इंसान क़ल्ब में होता है |  

Saturday, 20 May 2017

ग़ज़ल / غزل

ग़ज़ल 

मैं  हिज्र  में कितना  इंसाफ़ कर  रहा हूँ
आजकल तेरी याद में एतकाफ़ कर रहा हूँ

भटक भटक  कर उसकी गलियों  में अब
मैं अपने  ख़ुदा का  तवाफ़  कर रहा  हूँ

इश्क़  में  ज़रूरी  है  तबाही  दिल  की
मैं दिल को जला कर सफ़्फ़ाफ़ कर रहा हूँ

जैसा  भी  हूँ  जो  भी  हूँ तेरा  बन्दा हूँ
मैं अपने  गुनाहों  का एतराफ़ कर रहा हूँ

मैं इज़हार ए इश्क़ का ताब कहाँ से लाऊं
अपने  फ़ैसले  पे लाम काफ़  कर रहा हूँ


غزل


میں  ہجر  میں  کتنا  انصاف  کر  رہا  ہوں
آج  کل  تیری  یاد میں اعتکاف  کر رہا  ہوں

بھٹک  بھٹک کر  اسکی   گلیوں  میں  اب
میں   اپنے  خدا  کا   طواف  کر  رہا  ہوں 

 عشق   میں ضروری  ہے  تباہی   دل  کی
میں  دل  کو  جلا  کر  سفّاف  کر رہا  ہوں

جیسا بھی ہوں  جو بھی ہوں  تیرا بندہ ہوں
میں  اپنے  گناہوں کا  اعتراف کر  رہا  ہوں

میں اظہار عشق  کا  تعب کہاں  سے لاؤں
اپنے   فیصلے  پہ  لام کاف   کر رہا  ہوں




Sunday, 16 April 2017

ग़ज़ल / غزل

ग़ज़ल

कहाँ हो मेरे यार दिल की आरज़ू सुनो
आओ  क़रीब  बैठो  मेरे  रूबरू सुनो

दर्द  बेपनाह में इश्क़  को क्यों  छोडू
जल  रही है आँख सदा ए धू धू सुनो

आतिश ए सोज़ ओ सितम से है दर्द स्याह
कहता  है तेरी आँखों  की  ख़ुशबू  सुनो

तेरी लहर ए तबस्सुम पे लिखा है मेरा नाम  
लब ओ रुखसार  की कभी  जुस्तजू  सुनो

किस  तरह स्याही में मेरा चाँद घुल रहा
मुझ  को  ही पुकारता है तेरी बाज़ू सुनो


غزل 

کہاں  ہو  میرے  یار دل  کی  آرزو  سنو
آؤ   قریب   بیٹھو   میرے  روبرو  سنو

درد  بےپناہ  میں  عشق  کو  کیوں  چھوڑوں
جل  رہی  ہے   آنکھ  صدا  دھو  دھو  سنو

آتش  سوز و  ستم سے  ہے  درد  سیاہ
کہتا  ہے  تیری  آنکھوں  کی  خوشبو  سنو

تیری  لہر  تبسّم  پی لکھا ہے  میرا  نام
لب  و  رخسار  کی  کبھی  جستجو  سنو

کس طرح  سیاہی  مے  میرا  چاند  گھل  رہا
مجھ  کو  ہی  پکارتا  ہے  تیری بازو  سنو

Wednesday, 22 March 2017

ग़ज़ल / غزل


غزل 

وہ میری جان ہو گئے  ہیں  کیا
جان  ایمان  ہو  گئے  ہیں  کیا

انکی  کوئی خبر کوئی پتا  نہیں
وہ  بدگمان  ہو  گئے  ہیں  کیا

میں نے انکو تو نہیں کہا  بے وفا
وہ   پریشان  ہو  گئے  ہیں  کیا

میرے اشعار  چھپ رہے ہیں ان سے
وہ  بے میان  ہو  گئے   ہیں  کیا  

ان سے ملنے  کی  تمنا  جل رہی
وہ  آسمان   ہو  گئے  ہیں  کیا 



ग़ज़ल 

वो  मेरी जान  हो गए  हैं क्या
जान  ईमान हो  गए हैं  क्या

उनकी कोई ख़बर कोई पता नहीं
वो बदगुमान हो  गए  हैं  क्या

मैंने उनको तो नहीं कहा बेवफ़ा
वो  परेशान  हो गए  हैं क्या

मेरे अशआर छिप रहे  हैं उनसे
वो  बेमियान हो  गए  हैं क्या

उनसे मिलने की तमन्ना जल रही
वो  आसमान हो  गए  हैं  क्या

Tuesday, 7 February 2017

जीवन और मृत्यू के मध्य


मैं मर गया हूँ और मुझे मरे पांच दिन हो गए हैं, मेरे शरीर को यहाँ सुनसान, अनजान सी जगह पर लाशों से निकल कर कुछ कीड़े खा रहे हैं मगर न भारतीय पुलिस का कोई पता है, न ही कोई समाज सेवक का | हो भी कैसे जब प्रलय का भयावह दृश्य आप की आँखों के सामने गुज़र रहा हो तो कौन देखता है दूसरों को, देश तो छोड़िए, धर्म तो छोड़िए, लोग अपने बीवी-बच्चे, माँ-बाप तक की ख़बर नहीं लेते | मैं ठहरा एक अजनबी इस शहर का और देश का एक असफल समाज सेवक जिसने इंजीनियरिंग करने के बाद समाज कार्य की पढ़ाई एक प्रसिद्ध संस्था से की और फिर समाज कार्य में लग गया लेकिन बहुत प्रयत्न के बावजूद भी लोगों को अपनी बात समझा न सका | अब या तो मैं नाकारा था जिसने कुछ लोगों को अपनी बात समझा नहीं पाया या ये जो पड़े हैं बेगुनाह से हज़ारों लाश बेवक़ूफ़ थे, निपट जाहिल; तो लोग मेरी लाश की तलाश में क्योंकर इधर आएँगे |

ये जो पड़े हैं मेरे बराबर में, पहचानते हैं आप ? सहगल साहब हैं .... जयंत कुमार सहगल, देश  के प्रसिद्ध एवंम प्रतिष्ठित सिविल इंजिनियर, जो मुझे ये समझाने आए थे कि मैं फालतू, बेतुकी और बेबुनियाद बातें अखबारों या किताबों में लिख कर जनता में अफवाह न फैलाऊँ और अब देखिये बेचारे उस सच्चाई की चोट खा कर इस तरह पड़े हैं कि आँखों में कीड़े घुस रहे हैं जिन को अब भगा भी नही सकते | और सुना है जनाब कि प्रोफेसर शबनम नाज़ भी न रहीं, बहुत ही दर्दनाक मौत हुई उनकी | खैर साहब ये तो होना ही था जब स्वयं ही परिणाम को जानती हों और कुछ पैसों की लालच, ओहदे और शोहरत की भूख की वजहकर उसे छिपाएंगे तो उसको एक दिन यथार्थ तो खाएगा ही | लेकिन मेरे दोस्त ये बड़ा बुरा हुआ कि जनाब रस्कीन झागर साहब को भी इस क़हर ने नहीं छोड़ा, बड़े फिकरमंद और अक़लमंद इंसान थे | अक्सर कहा करते थे बेटा जिस दिन इंसान अपने आस पास के पर्यावरण से ऐसा ही प्रेम करने लगे जैसा वो अपने बच्चों और सम्बन्धियों से करता है उस दिन से आपदाओं को शर्म आएगी आते हुए उस जगह और उन इंसानों पे | 

मुझे याद है जब 2015 में मुल्क के अक्सर उत्तरी राज्यों में भूकम्प का झटका शुरू हुआ जो तक़रीबन एक महीने तक अवाम को डर व खौफ़ के साए में रखा और मौत की गिनती 200 तक हो गई थी जो नेपाल के खौफ़नाक तबाही से कम तो थी मगर जनता, सरकार और प्रगतिशील व्यक्तियों को सोचने पे मजबूर कर दिया था कि आख़िर ऐसे प्राकृतिक आपदाओं से लड़ने के क्या उपाय हों ? उसी दौरान मैंने अपने शिक्षक एवंम समाज कार्यकर्ता रस्किन झागर साहब से एक सवाल किया था कि अगर ऐसे ही भूकम्प के झटके की वजह से टिहरी बाँध टूट जाए तो उसका परिणाम क्या होगा और ये निवेदन किया था कि सरकार और विकास परियोजना से जुड़े लोगों की एक बैठक करवाई जाए और ऐसे अगामी समस्या पे मंथन किया जाए | हम ने चार महीने की कठिन परिश्रम के बाद एक कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया जिसमें विभिन्न श्रोतों से पुख्ता तथ्य पेश किए और ये बताने का प्रयत्न किया कि अगर टिहरी बाँध टूट जाए है तो टिहरी से दिल्ली तक के सारे शहर और गाँव पानी में डूब जाएंगे इसलिए ये आवश्यक है कि कुछ एहतियाती क़दम उठाए जाएं इस से पहले कि ये घटना घटे | मगर हमारी बातों को अनसुना कर दिया गया और हमें दबाने का प्रयत्न किया गया | हमारे ऊपर ये इलज़ाम लगाया गया कि हम विकास में रोड़े अटका रहे हैं और शोहरत के भूखे हैं |

मैं आज सोचता हूँ तो पाता हूँ कि यही उनकी भूल थी | खैर हमने अपनी आवाज़ को पूरी तरह से दबने तो नहीं दिया मगर अपनी बात मनवाने में कामयाब नहीं हुआ और उसी का परिणाम है कि आपकी आँखों के सामने बच्चे, बूढ़े, मर्द, औरत सब पानी की बड़ी सी आँख में स्वयं तैर रहे हैं जिन्हें तैरना सिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ी, स्वयं ही आधे घंटे पानी के अन्दर सिसकियाँ लेने के पश्चात सिख गए हैं | पैरों में फंसे चप्पल, खूंटे से बंधे जानवर, बदन से लिपटे कपड़े और दफ्तरों में क़ैद काग़ज़ात सारे आज़ाद हो गए हैं और ऐसे पानी पे बैठ कर भागे जा रहे हैं जैसे स्वामी उसे फिर से न पकड़ ले| टिहरी से दिल्ली तक की पूरी आबादी तबाह हो गई है सिर्फ़ एक भूकम्प के झटके से बाँध टूटी और फिर . . . . . . . . . बर्बादी . . . . सामने  . .है |

देखो मेरे कान में कोई कीड़ा घुसा जा रहा है...... बदबू भी कर रहा है.... कोई भगाओ इसे |

मैं देखता हूँ कि रेडियो, टेलीविज़न और फेसबुक पे लाशों ने टहलना शुरू कर दिया है | लोगों ने बेचना शुरू कर दिया है लाशों की जलावन, कुछ दफ्तरों में बैठे लोगों ने ख़रीद कर जलाना शुरू कर दिया है और नेताओं ने पकाना शुरू कर दिया है रोटी | अब बंटेगी रोटियाँ . . . . . . मेरे सामने भी पड़ी है, क्या उठा लूँ  . . . . . खा लूँ  . . .नहीं  . . . .  हाँ  . .  . नहींहींहीं  . .

ये कीड़े क्यों परेशान कर रहे हैं दूसरों की लाशों से मेरे शरीर पे क्यों आ रहे हैं . . . उफ्फ्फ़ काट लिया |

धराम  . . . . फ़ाइल गिरी | फ़ाइल गिरने की आवाज़ मेरे कानों में सूई की तरह चुभी और मेरी नींद टूट गई |

देखता हूँ कि मेरा दोस्त कोई फ़ाइल या किसी विशेष पुस्तक की तलाश में मेरे ही कक्ष में मेरी ही अलमारी में मग्न है और उसे ख़बर भी नहीं कि कोई फ़ाइल नाम की चीज़ अलमारी से उतर कर ज़मीन पे सर पटख चुकी है लेकिन एक मैं हूँ कि फ़ाइल गिरने की आवाज़ से एक दुनिया से दूसरी दुनिया में कूद आया | वैसे इस दर्दनाक सपने से बाहर लाने के लिए इस परेशान आत्मा का धन्यवाद तो करना चाहता था मगर सोचा रहने दो मग्न उसे उसके हाल पे कि शायद वो भी किसी सपने को कुरेद रहा हो जो कि ज़रूरी है मस्तिष्क में फँसे उलझनों को सुलझाने के लिए |


मुझे कॉन्फ्रेंस में जाना था इसलिए थोड़ी जल्दी की और तैयार हो कर रस्किन सर के कमरे में गया, सर को फैक्ट्स की फाइल दिया, कुछ वालंटियर को कार्यक्रम का विवरण दिया और कॉन्फ्रेंस हॉल में चला गया | ये 2015 का साल है, 2025 के खौफ़नाक तबाही को आने से पहले उसे ना आने देने पे बात करने का साल और उसी साल के एक अहम् दिन के लिए कॉन्फ्रेंस हॉल में बैठा हूँ जहाँ वही मरे हुए सहगल साहेब जिंदा मेरे बराबर में हैं, नाज़ साहिबा बड़े खुश व ख़ुर्रम बैठी किसी से बात कर रही है और रस्किन सर किसी सोच में कहीं गुम |  

( जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी के हिंदी यूनिट द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत कहानी | )   

Monday, 26 December 2016

राम राम जी


मुम्बई की शाख़ों से टूटा तो दिल्ली के पुराने दरख़्तों पे पनाह ली, मगर सर पे छत मिल जाना ही काफ़ी नहीं होता, गर्मी ने जब ख़्यालों को उबालना शुरू किया तो सुकून की तलाश में हिमालय की तराई में आकर क़याम किया, लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि यहाँ आकर सुकून की तलाश ख़त्म हो गई हो, हाँ मगर उन झमेलों से दूर, कुछ बेहतर है  | नेपाल से नज़दीक मगर हिन्दुस्तान की सरज़मीन पे बसा है ये छोटा सा गाँव, जहाँ से कुछ दूरी पे श्रावस्ती है, वो जगह जहाँ महात्मा बुद्ध अपनी ज़िन्दगी के दो साल बिताए थे | गाँव की आबादी मिली जुली है, हिन्दू, मुस्लिम और बोद्ध, तीनों मज़हब के लोग एक ही हवा में साँस लेते हैं | अब तक हवा का बँटवारा तो नहीं हुआ है मगर ज़मीन थोड़ी बंटी हुई दिखी कि गाँव के जुनूब और मग़रिब जानिब मुस्लिम बसे हैं और बाक़ी के दो सिम्त में हिन्दू और बोद्ध रहते हैं लेकिन दरगाह पे आपको तिलक और टोपी वालों में फ़र्क़ नज़र नहीं आएगा | 
मैं गुप्ता जी के दालान पे बैठा खाने का इंतज़ार कर रहा था कि तभी एक नौजवान टोपी पहने, चेहरे पे हल्की हल्की दाढ़ी और घुटनों तक लम्बा कुरता पहने मेरे क़रीब आकर बोला “राम-राम जी” और गुप्ता जी के घर के अन्दर दाख़िल हो गया | मैंने जवाब में राम-राम बड़ी आसानी और ख़ुश मिज़ाजी से बोल तो दिया था मगर ज़हन से निकल कर अजीबों ग़रीब क़िस्म के सवालात दिमाग पे हमला करने लगे लेकिन मेरा दिमाग़ भी इतना कमज़ोर न था कि उन सवालों का बेहतर जवाब न दे सके और इस तरह दिमाग़ और ज़हन के बीच होने वाली जंग की बला टली | इस हमले से थोड़ा थका हुआ दिमाग़ खाने के बर्तन पे आकर आराम करने ही वाला था कि दालान से नजर आ रही सामने वाली दीवार पे लिखा एक जुमला “गो हत्यारों को फाँसी दो” ने फिर से जंग का बिगुल बजा दिया था | इस बार मेरा दिमाग़ थोड़ा कमज़ोर पड़ने लगा था कि वो नौजवान फिर से मेरे क़रीब आकार रुका, मुझ से मेरा नाम पूछा, नाम सुन कर उस ने माफ़ी की दरख्वास्त करते हुए सलाम किया | मैं सलाम का जवाब देते हुए कहा “राम राम कहो या रहीम रहीम, मेरे लिए दोनों बराबर है” | ये सुन कर उसने मेरा हाथ अपनों हाथों में लिया पहले दोनों आँखों से फिर होठों से चूमने लगा जिस से साफ पता चलता था की गाँव वाले पीर बाबा का मुरीद होगा |
मेरे क़रीब बैठा एक शख्स मेरी तरफ़ देखा अपनी एक अंगुली दिमाग़ तक ले जा कर कहा “ये थोड़ा खिसका हुआ है” |

इस की बात सुन कर और नौजवान की मुहब्बत को देखकर, मन ही मन ये सोचने लगा कि काश दुनिया का हर इंसान इस नौजवान की तरह खिसका होता तो बेहतर होता कि मज़हब के नाम पे कोई लड़ाई न हो |          

Ghazal / غزل

غزل  عشق  کے  بخت  میں  بھی   آخرت  ہے ہجر  جہنم   تو   وصل    یار    جنّت      ہے    ڈھل  کر جسم   بھی اب   کنگال   ہو   گیا ...